टिहरी झील से भल्डगांव पर मंडरा रहा खतरा, विस्थापन की मांग को लेकर ग्रामीणों का आंदोलन तेज

उत्तरकाशी।  रिपोर्ट—महावीर सिंह राणा चिन्यालीसौड़ विकासखंड के भल्डगांव में टिहरी झील से बढ़ते भू-धंसाव, मकानों में आ रही दरारों और पुनर्वास-विस्थापन की मांग को लेकर ग्रामीणों का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पिछले तीन दिनों से झील किनारे धरने पर बैठे ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन पर अनदेखी का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांग पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे जल समाधि जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर होंगे।


ग्रामीणों के आंदोलन को उस समय राजनीतिक समर्थन भी मिला, जब पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उत्तरकाशी एवं भाजपा सदस्य दीपक बिजल्वाण धरना स्थल पर पहुंचे और ग्रामीणों की मांगों को अपना समर्थन दिया। बिजल्वाण ने ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीर बताते हुए कहा कि भल्डगांव के लोगों की सुरक्षा, पुनर्वास और विस्थापन का मामला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और भविष्य से जुड़ा संवेदनशील विषय है।


उन्होंने कहा कि ग्रामीण लंबे समय से अपनी मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। उनकी आवाज को शासन और प्रशासन तक मजबूती से पहुंचाने के साथ इस मामले में आगे भी हरसंभव पैरवी की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जनता के हक और क्षेत्र के हितों से जुड़े मामलों में वे पीछे नहीं हटेंगे।
झील के उतार-चढ़ाव से बढ़ रही ग्रामीणों की चिंता

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ग्रामीणों के मुताबिक भल्डगांव टिहरी झील के आरएल 835 मीटर से ऊपर स्थित है और गांव का कुछ हिस्सा आंशिक डूब क्षेत्र में आता है। झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव के कारण कई मकानों में दरारें आने तथा जमीन के भीतर पानी रिसने जैसी स्थिति सामने आने का ग्रामीण दावा कर रहे हैं।


ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से विस्थापन और पुनर्वास की मांग को लेकर संबंधित विभागों और अधिकारियों को पत्राचार किया जा रहा है। धरना, प्रदर्शन और भूख हड़ताल जैसे आंदोलन भी किए गए, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल पाया।
बताया जा रहा है कि गांव के करीब 15 परिवारों का विस्थापन किया जा चुका है, जबकि लगभग 35 परिवार गांव छोड़ चुके हैं। शेष परिवारों के सामने अब भी सुरक्षा और भविष्य के पुनर्वास का सवाल खड़ा है।
 रुड़की की ड्रोन सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

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ग्रामीणों ने दिसंबर 2025 में IIT रुड़की की ओर से कराए गए ड्रोन सर्वे को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सर्वे होने के बावजूद इसकी रिपोर्ट अभी तक ग्रामीणों को उपलब्ध नहीं कराई गई है।
ग्रामीणों के अनुसार स्थानीय भू-वैज्ञानिक की रिपोर्ट में भी झील के कारण गांव के खतरे में होने की बात सामने आई है। ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि सर्वे रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए और वैज्ञानिक आधार पर गांव की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए।


Tsdc की ओर से यह तर्क सामने आया है कि संबंधित सर्वे और रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि प्रक्रिया और रिपोर्ट के इंतजार के बीच यदि खतरा बढ़ता गया तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी।
जल समाधि की चेतावनी से बढ़ी प्रशासन की चुनौती
ग्रामीणों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि भल्डगांव के सुरक्षित विस्थापन और पुनर्वास को लेकर जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि वे झील के किनारे धरना जारी रखते हुए जरूरत पड़ने पर जल समाधि जैसे कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे।
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भल्डगांव के ग्रामीणों की वर्षों पुरानी विस्थापन की मांग पर सरकार और प्रशासन कब ठोस फैसला लेगा? क्या IIT रुड़की की ड्रोन सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक होगी? क्या भू-धंसाव और झील से प्रभावित परिवारों का नए सिरे से वैज्ञानिक सर्वे कराया जाएगा? और सबसे अहम—क्या खतरे में रह रहे परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास की प्रक्रिया समय रहते शुरू होगी?
भल्डगांव में ग्रामीणों का आंदोलन जारी है और दीपक बिजल्वाण के समर्थन के बाद यह मुद्दा अब स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ राजनीतिक स्तर पर भी और अधिक चर्चा में आ गया है।

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