उत्तरकाशी।
रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
वर्ष 2022 में द्रौपदी का डांडा (DKD-II) पर हुए भीषण हिमस्खलन ने पूरे देश को झकझोर दिया था। नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) के 27 पर्वतारोहियों और प्रशिक्षकों की जान लेने वाली इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया था। अब उसी DKD ट्रेक रूट पर स्थित खेड़ताल बुग्याल एक नए संकट की चपेट में है। तेजी से बढ़ते भू-धंसाव और मिट्टी के कटाव ने इस महत्वपूर्ण बुग्याल की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
करीब 2,400 मीटर की ऊंचाई पर लगभग 150 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला खेड़ताल बुग्याल केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि उत्तरकाशी के सबसे महत्वपूर्ण पर्वतारोहण प्रशिक्षण क्षेत्रों में भी शामिल है। यहीं से पर्वतारोही उच्च हिमालय की ओर अपने अभियान की शुरुआत करते हैं और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) के बेसिक एवं एडवांस पर्वतारोहण कोर्स भी इसी मार्ग से संचालित होते हैं।
हुर्री ग्राम प्रधान रमेश नेगी का कहना है कि यदि भू-कटाव की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में ट्रेकिंग और पर्वतारोहण गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं। उनका कहना है कि यह केवल स्थानीय समस्या नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पर्वतारोहण क्षेत्र की सुरक्षा का विषय है।
भुक्की निवासी विनीत पंवार के अनुसार खेड़ताल, भुक्की और हुर्री गांव से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित है। वर्तमान में बुग्याल के तीन अलग-अलग हिस्सों में स्लाइड जोन विकसित हो चुके हैं, जो लगभग 2 से 3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षात्मक कार्य नहीं किए गए तो यह क्षेत्र और अधिक अस्थिर हो सकता है।
विशेषज्ञ भी इस खतरे को गंभीर मान रहे हैं। भू-वैज्ञानिक एवं जिला खनन अधिकारी प्रदीप कुमार बताते हैं कि भटवाड़ी क्षेत्र भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। ऊंचाई वाले इलाकों में लगातार बर्फबारी और वर्षा के कारण बुग्यालों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है, जिससे मिट्टी कमजोर होकर स्लिप जोन बनने लगते हैं। यही प्रक्रिया वर्तमान भू-धंसाव का प्रमुख कारण मानी जा रही है।
वन विभाग ने भी इस समस्या को स्वीकार करते हुए समाधान की दिशा में पहल शुरू कर दी है। प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) डी.पी. बलूनी के अनुसार खेड़ताल क्षेत्र के लिए वेटलैंड मैनेजमेंट प्रोजेक्ट का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। योजना के तहत भू-धंसाव और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए वैज्ञानिक संरक्षण कार्य किए जाएंगे। प्रस्ताव को स्वीकृति मिलते ही धरातल पर काम शुरू कर दिया जाएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि DKD त्रासदी ने पहले ही इस पूरे क्षेत्र की संवेदनशीलता को सामने ला दिया था। ऐसे में खेड़ताल बुग्याल में बढ़ते भू-धंसाव को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े खतरे को आमंत्रण देने जैसा होगा। यह केवल एक बुग्याल का सवाल नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी, पर्वतारोहण गतिविधियों, स्थानीय पर्यटन और आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का विषय है।
अब निगाहें सरकार और संबंधित विभागों पर टिकी हैं कि वे इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं। यदि समय रहते प्रभावी संरक्षण उपाय लागू नहीं किए गए, तो उत्तरकाशी का यह महत्वपूर्ण हिमालयी क्षेत्र आने वाले वर्षों में एक बड़े पर्यावरणीय संकट का केंद्र बन सकता है।
भू-धंसाव की चपेट में खेड़ताल बुग्याल, हिमालय की इस धरोहर पर मंडराया संकट

