पुरोला उत्ततरकाशी
रजनीति में कुछ सफर ऐसे होते हैं, जिनकी शुरुआत बड़े राजनीतिक परिवारों, संसाधनों या विरासत से नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और आम आदमी के बीच से होती है। पूर्व विधायक मालचंद का राजनीतिक सफर भी ऐसी ही कहानी बयां करता है। एक सामान्य और गरीब परिवार से निकलकर मिस्त्री का काम करते हुए लोगों के बीच अपनी पहचान बनाना और फिर विधानसभा तक पहुंचना—मालचंद की करीब तीन दशक की राजनीतिक यात्रा संघर्ष और जनसंपर्क की कहानी है।
मालचंद बताते हैं कि उनके परिवार से पहले गांव के एक वार्ड तक में कोई सदस्य निर्वाचित नहीं हुआ था। ऐसे माहौल में उन्होंने राजनीति की शुरुआत क्षेत्र पंचायत सदस्य के रूप में की। आर्थिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि राजनीति के साथ उन्हें अपने पारंपरिक काम से भी परिवार चलाना पड़ता था। लेकिन लोगों के बीच लगातार मौजूदगी और उनकी समस्याओं से जुड़ाव ने धीरे-धीरे उन्हें क्षेत्र में पहचान दिलाई।
वार्ड सदस्य से विधानसभा तक का सफर
मालचंद के मुताबिक, एक समय उन्हें क्षेत्र पंचायत प्रमुख बनने के लिए भी कहा गया, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां उनके रास्ते में आ गईं। उन्होंने हार नहीं मानी और संगठन तथा जनता के बीच लगातार सक्रिय रहे।
इसके बाद वर्ष 2002 में भाजपा ने उन्हें पुरोला विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया। यह उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। चुनाव जीतकर उन्होंने पहली बार विधानसभा में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने लगातार दो बार विधायक के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
मालचंद बताते हैं कि उन्होंने अब तक पांच विधानसभा चुनाव लड़े, जिनमें दो बार जनता ने उन्हें विधानसभा भेजा, जबकि तीन चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके, उनका कहना है कि चुनावी हार ने उनके राजनीतिक संघर्ष और जनता से रिश्ते को कभी खत्म नहीं किया।
निर्माण से लेकर हरियाली तक—विकास की अपनी अलग छाप
मालचंद अपनी राजनीति में जनसेवा के साथ धार्मिक और पर्यावरणीय कार्यों को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि ईश्वर के प्रति उनकी गहरी आस्था रही है और विधायक रहते हुए उन्होंने पुरोला क्षेत्र में कई मंदिरों के निर्माण और विकास कार्यों में योगदान दिया।
उनके अनुसार, क्षेत्र में हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने करीब 27 हजार पौधे लगवाए। स्थानीय स्तर पर इन पेड़ों को आज भी लोग उनके नाम से जोड़कर देखते हैं और कई जगह इन्हें “मालचंद के पेड़” के नाम से पुकारे जाने की बात वह बताते हैं।
मैं गरीब परिवार से आया हूं, इसलिए आखिरी पंक्ति के व्यक्ति का दर्द समझता हूं”
मालचंद की राजनीतिक सोच का सबसे बड़ा आधार उनका अपना संघर्ष है। वह कहते हैं कि सामान्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें मालूम है कि सीमित संसाधनों में परिवार चलाना क्या होता है और समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की समस्याएं क्या होती हैं।
उनका कहना है कि करीब तीन दशक के राजनीतिक जीवन में उन्होंने गांव-गांव और आम लोगों के बीच रहकर यह समझा है कि विकास की वास्तविक जरूरतें क्या हैं। उनका दावा है कि राजनीति उनके लिए केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज बनने का रास्ता है, जिनकी पहुंच सत्ता के गलियारों तक आसानी से नहीं हो पाती।
अब नजर भाजपा के अगले फैसले पर
मालचंद की नजर अब आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा के फैसले पर है। उनका कहना है कि यदि पार्टी एक बार फिर उन पर विश्वास जताती है और उन्हें अवसर देती है तो वह पार्टी के भरोसे पर पूरी तरह खरा उतरने के लिए मैदान में उतरेंगे।
वह कहते हैं कि यदि जनता का आशीर्वाद और भाजपा का विश्वास साथ मिला तो वह पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ेंगे और क्षेत्र के विकास के लिए काम करेंगे।
पुरोला को अलग जिला बनाने का मुद्दा भी एजेंडे में
मालचंद ने पुरोला को अलग जिला बनाने की मांग को भी अपने संभावित राजनीतिक एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। उनका तर्क है कि उत्तरकाशी जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल काफी बड़ा है, ऐसे में प्रशासनिक सुविधा और क्षेत्र के संतुलित विकास के लिए पुरोला को अलग जिला बनाने की दिशा में गंभीर पहल होनी चाहिए।
वह मानते हैं कि पुरोला, यमुना घाटी और आसपास के क्षेत्रों में विकास की अपार संभावनाएं हैं। कृषि, बागवानी और स्थानीय संसाधनों को आधार बनाकर क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
“जनता का विश्वास मेरी सबसे बड़ी पूंजी”
मालचंद कहते हैं कि उनका राजनीतिक जीवन संघर्ष से शुरू हुआ और आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता के बीच उनका संपर्क है। वह प्रधानमंत्री और उत्तराखंड सरकार की विकास योजनाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर क्षेत्र में विकास की नई गति देने की बात कहते हैं।
उनका विश्वास है कि यदि उन्हें भाजपा की ओर से अवसर मिलता है और जनता दोबारा अपना आशीर्वाद देती है, तो वह पुरोला विधानसभा क्षेत्र के विकास को नई दिशा देने के लिए पूरी क्षमता से काम करेंगे।
एक सामान्य परिवार से निकलकर वार्ड सदस्य से विधायक बनने तक का सफर—मालचंद की राजनीतिक कहानी इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में लंबी पारी केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि जनता के बीच लगातार मौजूद रहने से बनती है। अब देखना यह होगा कि आगामी चुनावी समीकरणों में भाजपा अपने पुराने चेहरे और अनुभवी नेता मालचंद पर कितना भरोसा जताती है।

