जहां कभी युद्ध की वजह से खाली हुए थे गांव, वहां पहली बार पहुंची पोलियो की दो बूंदें; नेलांग, जादुंग और गंगोत्री में रचा गया इतिहास

उत्तरकाशी | महावीर सिंह राणा
भारत-चीन सीमा से लगे उत्तरकाशी जनपद के अत्यंत दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र नेलांग, जादुंग और गंगोत्री में रविवार को एक ऐसा ऐतिहासिक पल दर्ज हुआ, जिसने स्वास्थ्य सेवाओं के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया। आज़ादी के बाद पहली बार इन सीमांत क्षेत्रों में पोलियो बूथ स्थापित कर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई गई।


वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद नेलांग और जादुंग जैसे सीमांत गांव लगभग पूरी तरह खाली हो गए थे। वर्षों तक ये क्षेत्र केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे, लेकिन अब यहां सीमा सड़क संगठन (BRO), विभिन्न संस्थाओं और सीमित संख्या में रहने वाले परिवारों के बच्चे मौजूद हैं। पहली बार सरकार ने इन बच्चों तक भी पोलियो अभियान पहुंचाकर यह संदेश दिया कि देश का कोई भी बच्चा स्वास्थ्य सुरक्षा से वंचित नहीं रहेगा।

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दुर्गम पहाड़, कठिन रास्ते और सीमांत परिस्थितियों के बावजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भटवाड़ी की चिकित्सा टीम ने प्रत्येक पात्र बच्चे तक पहुंचकर “दो बूंद ज़िंदगी की” पिलाई। इस पूरे अभियान में सीमा सड़क संगठन (BRO) का सहयोग बेहद महत्वपूर्ण रहा। BRO के सहयोग से स्वास्थ्य टीम दुर्गम मार्गों को पार कर इन क्षेत्रों तक पहुंची और अभियान को सफल बनाया।
यह केवल पोलियो अभियान नहीं, बल्कि सरकार की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण है कि स्वास्थ्य सेवाएं अब देश के अंतिम छोर तक पहुंच रही हैं। जहां कभी युद्ध की गूंज सुनाई देती थी, वहीं आज बच्चों की मुस्कान और स्वास्थ्य सुरक्षा का संदेश गूंज रहा है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भटवाड़ी की पूरी टीम और BRO के संयुक्त प्रयासों से संभव हुआ यह अभियान आने वाले वर्षों के लिए एक मिसाल बनेगा। यह उपलब्धि बताती है कि सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले प्रत्येक बच्चे तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
दो बूंद ज़िंदगी की — हर बच्चे का अधिकार, हर परिवार की जिम्मेदारी।”

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