हिमालय की गोद में आस्था का अद्भुत संगम, बेडथात में गूंजा नागराज देवता का जयघोष

उत्तरकाशी। हिमालय की गोद में बसे उत्तरकाशी के बेडथात (इंद्रकील पर्वत) में आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। भाद्रपद (भादो) संक्रांति के पावन अवसर पर धनारी पट्टी और गमरी पट्टी के लोगों ने यहां पारंपरिक दूधगाडू मेले का भव्य आयोजन किया। नागराज देवता के मंदिर में आयोजित इस धार्मिक मेले में क्षेत्र के हजारों श्रद्धालु कई किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई तय कर अपनी आराध्य देवता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे।

धनारी पट्टी के पटूड़ी, ढुंगलधार, बग्याल गांव, थाती, ईड आदि गांवों तथा गमरी पट्टी के उलण, जयपुर, महरगांव, चमियारी समेत आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बेडथात पहुंचे। श्रद्धालुओं के जयकारों और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।
दूध-दही से नागराज देवता का अभिषेक
दूधगाडू मेले की सबसे प्रमुख धार्मिक परंपरा के तहत श्रद्धालुओं ने सैकड़ों लीटर दूध और दही से नागराज देवता का अभिषेक किया। इसके बाद परिवार, गांव, क्षेत्र और देश की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की गई। देव डोलियों की मौजूदगी और पारंपरिक पूजा-अर्चना ने मेले की आध्यात्मिक छटा को और भी भव्य बना दिया।

लोक आस्था से जुड़ी है बेडथात की पौराणिक मान्यता
स्थानीय लोक मान्यताओं और पौराणिक परंपराओं के अनुसार बेडथात का संबंध नागराज देवता की प्राचीन यात्रा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिया नाग का उद्धार किए जाने के बाद नागराज ने उत्तराखंड की धरती को अपना धाम बनाया। स्थानीय मान्यता के अनुसार सेम मुखेम की ओर जाते समय नागराज ने इसी स्थान पर विश्राम किया था, जिसके चलते यह स्थान बेडथात के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इसी पौराणिक आस्था और लोक विश्वास को पीढ़ियों से संजोए धनारी और गमरी पट्टी के ग्रामीण आज भी दूधगाडू मेले को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं।
संस्कृति और परंपरा का जीवंत दस्तावेज बना मेला
बेडथात का दूधगाडू मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि उत्तरकाशी की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है। कठिन पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर हजारों श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना इस क्षेत्र की गहरी देव आस्था को दर्शाता है।

हिमालय की ऊंची चोटियों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच देव डोलियों, जयकारों, पूजा-अर्चना और दूध-दही के अभिषेक से बेडथात का पूरा क्षेत्र आस्था के रंग में रंगा नजर आया। श्रद्धालुओं ने नागराज देवता से क्षेत्र में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना की।
बेडथात का यह दूधगाडू मेला उत्तरकाशी की उस जीवंत लोक परंपरा की तस्वीर पेश करता है, जहां हिमालय की प्रकृति, देव आस्था और सदियों पुरानी संस्कृति आज भी एक साथ सांस लेती दिखाई देती है।

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