डबल इंजन के दावों के बीच दम तोड़ती पहाड़ की हकीकत”

लोकेशन: डुमक गांव, ज्योतिर्मठ (जोशीमठ)
रिपोर्ट: महावीर सिंह राणा

उत्तराखंड में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई आज भी पहाड़ के दूरस्थ गांवों में दर्दनाक तस्वीर पेश कर रही है। जोशीमठ ब्लॉक के सन वैली स्थित डुमक गांव में एक बार फिर सिस्टम की नाकामी उजागर हुई है।


डुमक गांव की 70 वर्षीय जशोदा देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई, लेकिन गांव में न सड़क, न एंबुलेंस और न ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा। ऐसे में मजबूर ग्रामीणों को मानवता के सहारे “डंडी-कंडी” ही एंबुलेंस बनानी पड़ी।
ग्रामीणों ने जान जोखिम में डालकर बुजुर्ग महिला को करीब 8 किलोमीटर तक पथरीले और खतरनाक रास्तों से कंधों पर ढोया, तब जाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया। वहां से वाहन की मदद से उन्हें गोपेश्वर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।
“क्या यही है विकास?”

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आप वीडियो में दे सकते हैं किस तरह से ले जा रहे हैं मरीज को

 बड़ा सवाल यह है कि आज जब सरकार “डबल इंजन विकास” की बात करती है, तब भी पहाड़ के लोग बीमार होने पर अपने कंधों पर जिंदगी ढोने को मजबूर क्यों हैं?
डुमक गांव के लोगों का कहना है कि:
वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है
कई बार धरना-प्रदर्शन भी हुए
लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई
हर आपात स्थिति में ग्रामीणों को इसी तरह मरीजों को कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ता है, जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है।
“सरकार की प्राथमिकता में नहीं पहाड़?”
यह घटना सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की सच्चाई है। सवाल उठता है कि:
क्या विकास सिर्फ कागजों तक सीमित है?
क्या दूरस्थ गांवों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
आखिर कब बदलेगी पहाड़ की तस्वीर?
“ग्रामीणों की मांग”
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि:
जल्द से जल्द सड़क निर्माण किया जाए
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जाए
ताकि भविष्य में किसी को इस तरह जिंदगी और मौत के बीच जूझना न पड़े

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