वीर सिंह रौतेला की शौर्य गाथा और विरासत पर संकट पर्यटन विभाग भी नहीं लेता है संज्ञान

उत्तरकाशी
रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
गढ़वाल की भूमि गढ़ों एवं भड़ो (वीरों) की भूमि रही है, उत्तरकाशी जनपद की हर्षिल घाटी अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है, ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र सीमांत संघर्षों एवं छोटे-छोटे राज्यों के टकराव का साक्षी रहा है। उस दौरान जब राज्यों की पक्की सीमाएँ अस्तित्व में नहीं थी तो भूमि, संसाधनों एवं अस्मिता कि रक्षा की रक्षा सबसे बड़ा धर्म माना जाता रहा, उसके लिए लोग प्राणों की बाजी तक लगा ले जाते थे । हर्षिल घाटी के भड़ वीर सिंह रौतेला, ऐसे ही एक योद्धा थे जिन्होंने युद्ध लड़े और अपने समाज के संरक्षक और मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने मजबूत पहचान बनाई ।

बीर सिंह को इस घाटी की लोक परंपराओं, गीतों, पवाड़ों में ना केवल एक रणबांकुरे के रूप में, बल्कि साथ में न्यायप्रिय एवं जनहितकारी नेतृत्वकर्ता के रूप में भी याद किया जाता है। उनके युग में “धाड़ा मारना’ केवल लूटपाट का पर्याय नहीं था, बल्कि सीमांत समाज के अस्तित्व व संसाधनों की रक्षा का रणनीतिक संकल्प था। बड़ासू (हर की दून क्षेत्र) से लेकर सामरिक दृष्टि से माणा तक उनके साहसिक अभियानों की कथा-कहानियाँ यहाँ के लोक समाज में आज भी सुनाई देती है, किसी भी युद्ध में सिर्फ विजय प्राप्त करना उनका लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि अपने क्षेत्र सम्मान एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना पहला दायित्व रहा। वीर सिंह के जीवन का सबसे सबसे मार्मिक एवं गौरवपूर्ण अध्याय माणा घारी का युद्ध माना जाता है, सीमांत सुरक्षा के लिए वे अपने साथियों के साथ आगे बढ़े, जहां उनके साथ घंटों तक भीषण संघर्ष चला। आखिर ! में वे अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए, यह बलिदान एक युद्ध का खटमा नहीं था बल्कि एक अमर गाथा की शुरुआत थी।

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इनकी वीरगाथा को जन-जन तक पहुंचाने में एक औजी (ढोल वादक) की अद्भुत सूझबूझ का विशेष योगदान रहा, बुद्ध के बाद जब सभी योद्धा शहीद हो गए, तब उसने स्वयं को मृतकों के बीच इस प्रकार

छिपा लिया ताकि शत्रु उसे पहचान न सके। रात के अंधेरे में वह दुर्गम रास्तों से होता हुआ झाला गांव पहुंचा और इस बलिदान की कथा को जीवित रखा। आज भी माणा में उनसे जुड़ी बंदूक और झाला में सुरक्षित रखा गया ढोल इस इतिहास के साक्ष्य माने जाते हैं।

इसी ऐतिहासिक विरासत का भौतिक प्रतीक है

झाला गांव स्थित “वीर सिंह भवन”, जिसे स्थानीय रूप में “पंचपुरा’ कहा जाता है। लगभग 350 वर्ष पुराना यह पांच मंजिला भवन उत्तराखंड की पारंपरिक काष्ठकला और पत्थर-मिट्टी आधारित वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। आधुनिक तकनीक के अभाव में निर्मित यह संरचना उस समय की निर्माण दक्षता और सौंदर्यबोध का परिचायक है। जनश्रुतियों के अनुसार, इसका निर्माण वीर सिंह रौतेला के पूर्वजों द्वारा कराया गया था, जो उस समय क्षेत्र में अपनी वीरता और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए विख्यात थे।

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दुर्भाग्यवश, यह ऐतिहासिक धरोहर आज गंभीर उपेक्षा का शिकार है, भवन की दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, लकड़ी का ढांचा कमजोर हो रहा है और पूरी संरचना ढहने की कगार पर पहुंच गई है। यह स्थिति न केवल एक अमूल्य धरोहर के अस्तित्व पर संकट है, बल्कि आसपास के निवासियों और राहगीरों की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन चुकी है।

झाला ग्राम पंचायत और स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से इस भवन के संरक्षण की मांग कर रहे है,

उन्होंने क्षेत्रीय पुरातत्व विभाग सहित जिला प्रशासन को कई बार अवगत कराया है और वैज्ञानिक तरीके से मरम्मत व संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उनका उद्देश्य भवन को हटाना नहीं, बल्कि उसकी मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए उसे संरक्षित करना है।

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इस दिशा में ग्रामीणों ने एक सकारात्मक और दूरदर्शी प्रस्ताव भी रखा है- “वीर सिंह भवन” को संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाए, इससे न केवल हर्षिल घाटी और टकनौर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत संरक्षित होगी, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

हमारी मांग है कि संबंधित विभाग शीघ्र स्थल निरीक्षण कर ठोस कार्ययोजना तैयार करे, इससे “चौर सिंह भवन’ न केवल अतीत की गौरवगाथा को सहेज पाएगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का जीवंत स्रोत भी बन सकेगा अभिषेक रौतेला प्रधान

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