“जब पहाड़ की थाली बनेगी पहचान: मास्टर शेफ टीकाराम सिंह का वैश्विक मंच से उत्तराखंड को संदेश”

उत्तरकाशी
रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
गांव ठांडी से यूरोप तक का सफर, अब जड़ों की ओर लौटने का आह्वान
उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्र उत्तरकाशी की गाजना लाल घाटी में बसे छोटे से गांव ठांडी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले मास्टर शेफ टीकाराम सिंह आज केवल एक शेफ नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति और परंपराओं के दूत बन चुके हैं।


उनकी कहानी संघर्ष, समर्पण और अपनी जड़ों से गहरे जुड़ाव की कहानी है—एक ऐसी कहानी, जो आज पूरे उत्तराखंड के लिए प्रेरणा बन सकती है।
संघर्ष से सफलता तक: एक प्रेरक यात्रा
साधारण परिवार में जन्मे टीकाराम सिंह ने अपने करियर की शुरुआत भारत के होटल उद्योग से की। सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने हुनर को तराशा और आगे बढ़ते हुए दुबई में काम किया।
आज वे पिछले पांच वर्षों से नीदरलैंड में कार्यरत हैं और यूरोप के कई देशों—बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस और इटली—में अपने अनुभवों से एक अलग पहचान बना चुके हैं।
यूरोप से मिली सीख: अपनी जड़ों पर गर्व
यूरोप की यात्रा के दौरान उन्होंने एक गहरी बात महसूस की—

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वहां के लोग अपने पारंपरिक भोजन और भाषा पर गर्व करते हैं।
चाहे बेल्जियम के वाफ़ल्स हों या इटली का पास्ता और पिज्जा—ये व्यंजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान का हिस्सा हैं। इन्हें आधुनिक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उनकी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा जाता।
ऋषिकेश का एक कैफे और बदलती सोच
टीकाराम सिंह बताते हैं कि ऋषिकेश में एक कैफे पर “बेल्जियम वाफ़ल्स” लिखा देख उन्हें गहरा झटका लगा।
“हम विदेशी चीज़ों को बहुत जल्दी अपना लेते हैं, लेकिन अपने ही पारंपरिक व्यंजनों को भूलते जा रहे हैं,”
उन्होंने भावुक होकर कहा।
यही वह क्षण था, जब उनके भीतर एक संकल्प पैदा हुआ

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“पहाड़ की थाली को उसका सम्मान दिलाना।”
पहाड़ की ‘औषधीय थाली’: स्वाद के साथ स्वास्थ्य
उत्तराखंड की पारंपरिक थाली केवल भोजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का खजाना है।
इसमें शामिल हैं—
मंडुवा, झंगोरा ,चोलाई,लिंगुड़ा,बुरांश,काफल
ये सभी खाद्य पदार्थ आज “सुपरफूड” के रूप में दुनिया में पहचान बना रहे हैं।
स्वास्थ्य लाभ:
लिंगुड़ा पाचन में सहायक
बुरांश – हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी
मंडुवा और झंगोरा – मधुमेह और मोटापे में उपयोगी
बड़ी अपील: होटल, होम-स्टे और उद्यमियों से जुड़ने का आह्वान
मास्टर शेफ टीकाराम सिंह ने उत्तराखंड के होटल संचालकों ,होम-स्टे मालिकों,स्थानीय उद्यमियों
से अपील की है कि वे अपने मेन्यू में पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को शामिल करें।
उन्होंने इसके लिए निःशुल्क प्रशिक्षण देने की पेशकश भी की है, ताकि इन व्यंजनों को आधुनिक और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया जा सके।
आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव की संभावनाएं
यदि इस पहल को अपनाया जाता है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं—
पर्यटकों को मिलेगा असली पहाड़ी अनुभव
स्थानीय किसानों की आय बढ़ेगी
पारंपरिक खेती को मिलेगा बढ़ावा
सांस्कृतिक पहचान होगी मजबूत
खतरे में विरासत: युवाओं से दूर होते स्वाद
आज की युवा पीढ़ी तेजी से फास्ट फूड और बाहरी खानपान की ओर आकर्षित हो रही है।
गांवों में भी पारंपरिक व्यंजनों का उपयोग कम होता जा रहा है, जिससे यह अमूल्य विरासत धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर पहुंच रही है।
एक आह्वान, एक आंदोलन की शुरुआत
मास्टर शेफ टीकाराम सिंह की यह पहल केवल एक व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत बन सकती है।
यह समय है—
अपनी जड़ों से जुड़ने का
स्वास्थ्य को अपनाने का
और अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का
अब निर्णय हमारे हाथ में है—
क्या हम इस चिंगारी को जनआंदोलन बनाएंगे, या इसे बुझने देंगे।

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