एशिया के सबसे बड़े बांध की झील उत्तरकाशी तक पहुंची, लेकिन झील किनारे बसे गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं की राह ताक रहे

उत्तरकाशी/चिन्यालीसौड़।रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
एशिया के सबसे बड़े बांधों में शुमार टिहरी बांध भले ही टिहरी जिले में बना हो, लेकिन इसकी विशाल झील की सीमा उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ क्षेत्र तक पहुंचती है। बांध और झील के नाम पर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन झील से सटे कई गांवों की जमीनी तस्वीर इन दावों से अलग कहानी बयां कर रही है।


चिन्यालीसौड़ विकासखंड के कई गांव आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं। बांध निर्माण के दौरान कई गांव झील में समा गए, जबकि झील के बेहद करीब बसे कुछ गांव आज भी इसके दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि झील के कारण कई स्थानों पर लगातार भू-कटाव की स्थिति बनी हुई है और भविष्य को लेकर ग्रामीण चिंतित हैं।
गांवों के विकास का मुद्दा फिर गरमाया
चिन्यालीसौड़ ब्लॉक प्रमुख रणवीर सिंह महंत ने टिहरी बांध से प्रभावित क्षेत्र के 16 गांवों के विकास का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इन गांवों को आज भी अपेक्षित विकास और मूलभूत सुविधाओं का इंतजार है।

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ब्लॉक प्रमुख का कहना है कि टिहरी बांध से जुड़ी संस्था टीएचडीसी द्वारा हाईकोर्ट में यह हलफनामा दिया गया था कि बांध परियोजना से प्रभावित सभी गांवों का विस्थापन कर दिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। उनका दावा है कि क्षेत्र के कई गांवों में आज भी विकास कार्य अधूरे हैं और ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कागजों में विकास, जमीन पर इंतजार?
ब्लॉक प्रमुख रणवीर सिंह महंत के मुताबिक इन गांवों की समस्याओं को लेकर कई बार संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार संस्थाओं को लिखित एवं मौखिक रूप से अवगत कराया गया है, लेकिन अभी तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि यदि जल्द ही इन 16 गांवों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया और विकास कार्यों को गति नहीं दी गई तो क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों के साथ प्रतिनिधिमंडल के रूप में उच्च स्तर पर आंदोलनात्मक कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
टीएचडीसी की भूमिका पर भी उठे सवाल

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ब्लॉक प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बांध परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के विकास और ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान को लेकर जिम्मेदार संस्था को गंभीरता दिखानी होगी। यदि समय रहते प्रभावित गांवों की सुध नहीं ली गई तो आगे होने वाली किसी भी आंदोलनात्मक स्थिति की जिम्मेदारी टीएचडीसी की होगी।
टिहरी बांध की झील उत्तरकाशी तक पहुंचने के बावजूद यदि झील किनारे बसे गांव आज भी विकास की राह देख रहे हैं, तो यह सवाल निश्चित तौर पर जिम्मेदार एजेंसियों और शासन-प्रशासन के सामने खड़ा होता है कि आखिर बांध परियोजना से प्रभावित इन ग्रामीण क्षेत्रों के विकास का इंतजार कब खत्म होगा?
अब देखना होगा कि 16 गांवों की इस मांग पर शासन-प्रशासन और टीएचडीसी क्या कदम उठाते हैं।

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