उत्तरकाशी
रिपोर्ट गंगोत्री न्यूज़ एक्सप्रेस
“विकास की बड़ी-बड़ी बातें, लेकिन पहाड़ों की सच्चाई आज भी पेड़ की शाखाओं पर झूलती नजर आती है।”
उत्तरकाशी जनपद के विकासखंड मोरी के दूरस्थ ओसला–गंगाड़ क्षेत्र से सामने आई यह तस्वीर केवल एक फोटो नहीं, बल्कि व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। यहां आज भी ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर पेड़ की शाखाओं के सहारे उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं। यह दृश्य उन दावों को चुनौती देता है, जिनमें पहाड़ों तक विकास पहुंचने की बात कही जाती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से सुरक्षित पुल और वैकल्पिक आवागमन की मांग की जा रही है, लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। मजबूरी ऐसी है कि स्कूली बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और ग्रामीण रोज इसी खतरनाक रास्ते से गुजरते हैं। बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ यह सफर मौत के मुहाने तक पहुंच जाता है।
इस लापरवाही की कीमत गुरुवार को एक बुजुर्ग को चुकानी पड़ी। नदी पार करते समय उनका संतुलन बिगड़ गया और वे तेज बहाव में गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें बाहर निकाला और उपचार के लिए भेजा।
ग्रामीणों का आरोप है कि योजनाएं फाइलों और घोषणाओं तक सीमित रह गई हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि आज भी लोग 21वीं सदी में पेड़ की शाखाओं के सहारे नदी पार करने को विवश हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि— क्या पहाड़ों का विकास केवल भाषणों और कागजों तक ही सीमित रहेगा?
क्या दूरस्थ गांवों के लोगों की जिंदगी की कीमत इतनी कम है कि हर बरसात में उन्हें मौत से मुकाबला करना पड़े?
और आखिर डबल इंजन सरकार के तमाम विकास दावों के बावजूद पहाड़ के लोगों को सुरक्षित पुल जैसी मूलभूत सुविधा कब मिलेगी?
यह तस्वीर सिर्फ ओसला–गंगाड़ की नहीं, बल्कि उन तमाम दुर्गम गांवों की आवाज है, जहां आज भी विकास का इंतजार खत्म नहीं हुआ है। अब जिम्मेदार विभागों और जनप्रतिनिधियों को तय करना होगा कि पहाड़ों के लोगों को वादे चाहिए या सुरक्षित जीवन।

