उत्तरकाशी। रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बसे उत्तराखंड के उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक के अंतर्गत स्यावा गांव की पहचान केवल उनकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि उन सदियों पुरानी परंपराओं से भी है, जिन्हें यहां की पीढ़ियां आज तक अपने सीने से लगाए हुए हैं। इन्हीं जीवंत परंपराओं में एक अनूठा नाम है
सेलकू मेला।

भटवाड़ी ब्लॉक के कई गांवों में आयोजित होने वाला सेलकू ऐसा लोकपर्व है, जिसकी रात सामान्य रातों जैसी नहीं होती। इस रात नींद को जैसे गांव से विदा कर दिया जाता है। मेले में पहुंचा कोई भी व्यक्ति रातभर जागता है। कहीं देव आराधना होती है, कहीं लोकगीतों की स्वर लहरियां उठती हैं, कहीं रासो की कतारें बनती हैं और कहीं पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं अपनी जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

यह केवल मेला नहीं, बल्कि देवभूमि की उस सांस्कृतिक स्मृति का उत्सव है, जिसमें धर्म, प्रकृति, लोकगीत, नृत्य और रिश्तों की गर्माहट एक साथ दिखाई देती है।
सोमेश्वर देवता की आराधना से शुरू होती है आस्था की रात
सेलकू मेले का केंद्र हैं क्षेत्र के इष्ट देवता सोमेश्वर देवता। देवता की विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मेले की रात अपने विशिष्ट रूप में प्रवेश करती है।
देव परंपरा में पशुआ की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता के अनुसार जिन पशुआ पर देवता का अवतरण होता है, उनके माध्यम से देव परंपरा से जुड़े कई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
इसी दौरान सामने आती है सेलकू की वह परंपरा, जिसे देखकर श्रद्धालु रोमांचित भी होते हैं और आस्था से भर भी जाते हैं।
डांगरों पर नंगे पांव चलती आस्था

वही स्यावा गांव के सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह राणा ने बताते है कि लोहे से निर्मित पारंपरिक धारदार हथियारों को स्थानीय रूप से डांगरा कहा जाता है। देव परंपरा के अनुष्ठान के दौरान पशुआ इन डांगरों के ऊपर नंगे पांव चलते हैं।
यह दृश्य सेलकू मेले की सबसे विशिष्ट पहचान में से एक है। सामने देवता की आराधना, चारों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ और बीच में डांगरों पर चलता पशुआ—यह दृश्य हिमालय की गहरी लोक आस्था और सदियों पुरानी देव परंपरा की जीवंत तस्वीर बन जाता है।
यहां आस्था केवल पूजा स्थल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लोकजीवन का हिस्सा बनकर सामने आती है।
हिमालय की ऊंचाइयों से उतरते हैं दुर्लभ फूल

सेलकू की परंपरा प्रकृति से भी गहराई से जुड़ी है।
ऊंचे और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से विभिन्न प्रकार के पारंपरिक एवं दुर्लभ पुष्प लाए जाते हैं। ब्रह्मकमल सहित कई हिमालयी फूल देवता को अर्पित किए जाते हैं और बाद में श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं।
कई पुष्प ऐसे भी होते हैं, जिनके नाम तक आज की पीढ़ी के बहुत से लोगों को मालूम नहीं हैं। यही कारण है कि शेलकू केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हिमालयी प्रकृति और लोकविश्वास के बीच सदियों पुराने रिश्ते को भी सामने लाता है।
सेलकू की रात लौटती हैं बेटियां
इस मेले का सबसे भावुक पक्ष शायद वह है, जब बाहर ब्याही गई बेटियां अपने मायके लौटती हैं।
वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत विवाहित बेटियां इस अवसर पर अपने मायके आती हैं। पुराने आंगन फिर से खिल उठते हैं। सखियां मिलती हैं, रिश्तेदार जुटते हैं और बचपन की यादें फिर से जीवंत हो जाती हैं।
किसी के लिए यह देवता का मेला है, किसी के लिए लोकसंस्कृति का पर्व, लेकिन मायके लौटने वाली बेटियों के लिए शेलकू अपने बचपन और अपने घर की ओर लौटने का अवसर भी है।
रातभर गूंजता है रासो… पुरुषों की तान, महिलाओं का जवाब
जैसे-जैसे रात गहराती है, सेलकू का रंग और गहरा होता जाता है।
महिलाएं और पुरुष हाथों में हाथ थामकर अलग-अलग पंक्तियों में रासो नृत्य करते हैं। पारंपरिक गढ़वाली गीतों की स्वर लहरियां वातावरण में गूंजती हैं।
कभी पुरुषों की टोली गीत की पंक्ति उठाती है तो कभी महिलाएं उसका जवाब देती हैं। पुराणिक और पारंपरिक गीतों को दोहराते हुए पूरी रात लोकसंस्कृति का यह संवाद चलता रहता है।
यहां कोई मंच नहीं, कोई दर्शक-कलाकार का विभाजन नहीं। पूरा गांव ही कलाकार है और पूरा गांव ही दर्शक।
हर उम्र की अपनी टोली, फिर भी सब एक साथ
सेलकू की खूबसूरती इसकी सामूहिकता में है।
बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग पंक्तियां होती हैं। युवाओं की अपनी टोली होती है और बालक-बालिकाओं के लिए अलग स्थान एवं घेरे बनाए जाते हैं।
इस व्यवस्था में एक खूबसूरत संदेश छिपा है
परंपरा किसी एक पीढ़ी की नहीं होती।
बुजुर्ग अपनी विरासत अगली पीढ़ी को सौंपते हैं, युवा उसे आगे बढ़ाते हैं और बच्चे उसे अपनी आंखों से देखकर सीखते हैं।
यहां अतिथि नहीं, परिवार बनकर आते हैं लोग
सेलकू का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है यहां का अतिथि सत्कार।
बाहर से आने वाले मेहमानों को स्थानीय परिवार अपने घरों में भोजन कराते हैं। अतिथियों का सादर स्वागत और अभिनंदन किया जाता है। पहाड़ की यही परंपरा सेलकू को और आत्मीय बना देती है।
यहां आने वाला व्यक्ति केवल मेले का हिस्सा नहीं रहता, बल्कि कुछ समय के लिए उस गांव के परिवार का सदस्य बन जाता है।
एक रात… लेकिन कई पीढ़ियों की कहानी
सेलकू की रात भले ही एक रात की होती है, लेकिन उसमें सदियों की कहानी समाई होती है।
इसमें देवता हैं, लोकविश्वास है, हिमालय के फूल हैं, डांगरा है, रासो है, गढ़वाली गीत हैं, मायके लौटती बेटियां हैं, बुजुर्गों की स्मृतियां हैं, युवाओं का उत्साह है और बच्चों के लिए अपनी संस्कृति को समझने का अवसर है।
सामाजिक कार्यकर्ता हों या जनप्रतिनिधि और राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोग—सभी इस आयोजन में शामिल होकर इस सांस्कृतिक विरासत के साक्षी बनते हैं।
सेलकू—भटवाड़ी की पहचान, उत्तराखंड की विरासत
आज जब आधुनिकता तेजी से गांवों की जीवनशैली बदल रही है, ऐसे समय में शेलकू जैसी परंपराएं यह याद दिलाती हैं कि विकास के साथ अपनी जड़ों को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
सेलकू वह रात है जब गांव सोता नहीं…
देवता की आराधना होती है…
लोकगीतों की आवाज थमती नहीं…
रासो की कतारें टूटती नहीं…
बेटियां मायके लौटती हैं…
और एक पूरी संस्कृति रातभर जागकर अगली पीढ़ी को अपनी कहानी सुनाती है।
यही सेलकू की असली खूबसूरती है।
यह उत्तरकाशी की सांस्कृतिक पहचान है।
और यह देवभूमि उत्तराखंड की जीवित लोक विरासत है।

