सिर्फ एक शहीद नहीं, उत्तराखंड की आत्मा हैं श्रीदेव सुमन

उत्तरकाशी।
रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
हर वर्ष 25 जुलाई को उत्तराखंड में श्रीदेव सुमन दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम या औपचारिक श्रद्धांजलि का दिन नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस, आत्मबल और लोकतांत्रिक चेतना को नमन करने का अवसर है जिसने टिहरी रियासत की निरंकुश व्यवस्था को चुनौती दी।


इस वर्ष भी उत्तरकाशी में सुमन दिवस पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ मनाया गया। जिला मुख्यालय के हनुमान चौक, कलेक्ट्रेट परिसर और शहीद स्मारक में आयोजित कार्यक्रमों में जिलाधिकारी प्रशांत आर्य सहित जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, विद्यार्थियों और नागरिकों ने अमर शहीद श्रीदेव सुमन को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रभातफेरी निकाली गई, माल्यार्पण किया गया, पौधरोपण हुआ और नई पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर श्रीदेव सुमन कौन थे, जिनकी याद आज भी उत्तराखंड के जनमानस में इतनी गहराई से जीवित है?


एक ऐसा युवा, जिसने अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर दिया
25 मई 1916 को टिहरी रियासत के जौल गांव में जन्मे श्रीदेव सुमन बचपन से ही तेजस्वी, संवेदनशील और देशभक्त थे। जब पूरा देश अंग्रेजी शासन से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब टिहरी रियासत के लोग दोहरी गुलामी झेल रहे थे—एक ओर अंग्रेज और दूसरी ओर रियासत की दमनकारी व्यवस्था।

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सुमन ने जनता के अधिकारों की आवाज बुलंद की। उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की मांग उठाई। यही आवाज तत्कालीन शासन को नागवार गुजरी और उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
84 दिन का अनशन… लेकिन हौसला नहीं टूटा
जेल में अमानवीय व्यवहार के विरोध में श्रीदेव सुमन ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह कोई एक-दो दिन का विरोध नहीं था, बल्कि 84 दिनों तक चला ऐतिहासिक अनशन था।
शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनके इरादे नहीं डगमगाए। अंततः 25 जुलाई 1944 को उन्होंने जेल में ही प्राण त्याग दिए। कहा जाता है कि उनके पार्थिव शरीर को भी परिवार को नहीं सौंपा गया और चुपचाप नदी में बहा दिया गया।

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यही बलिदान उन्हें उत्तराखंड के इतिहास में अमर बना गया।
क्यों मनाया जाता है श्रीदेव सुमन दिवस?
श्रीदेव सुमन दिवस इसलिए मनाया जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार हमें सहज रूप से नहीं मिले, बल्कि इसके लिए अनेक लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया।


यह दिन हमें याद दिलाता है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही सच्ची देशभक्ति है और सत्य के मार्ग पर डटे रहने का साहस ही किसी व्यक्ति को अमर बना देता है।
उत्तरकाशी ने किया नमन
उत्तरकाशी में आयोजित कार्यक्रमों में विद्यार्थियों ने प्रभातफेरी निकाली, निबंध, चित्रकला, भाषण और नाटक प्रतियोगिताओं के माध्यम से सुमन के जीवन को जाना। जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने कहा कि श्रीदेव सुमन का जीवन संघर्ष, त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल है तथा प्रत्येक व्यक्ति को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
शहीद स्मारक पर पौधरोपण कर उनके सपनों के अनुरूप प्रकृति संरक्षण का संदेश भी दिया गया।
आज भी प्रासंगिक हैं श्रीदेव सुमन
आज जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब श्रीदेव सुमन का जीवन हमें सिखाता है कि परिवर्तन हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, सत्य, साहस और जनसेवा से आता है।
उनका संघर्ष केवल टिहरी रियासत तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हर उस व्यक्ति की आवाज थे जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होना चाहता था।
श्रीदेव सुमन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा हैं। उनका बलिदान आने वाली हर पीढ़ी को यह संदेश देता रहेगा कि सत्य और न्याय के लिए दिया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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