4 साल से अधूरा पुल, जान हथेली पर ग्रामीण ठेकेदार की लापरवाही से पुल अधूरा, ग्रामीण परेशान”

उत्तरकाशी |
रिपोर्ट : महावीर सिंह राणा
उत्तराखंड में विकास और “ट्रिपल इंजन सरकार” के बड़े-बड़े दावों के बीच उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी क्षेत्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी व्यवस्था और ठेकेदारी सिस्टम दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम पंचायत पिलंग, के ग्रामीण आज भी एक छोटे से पुल के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
करीब 48 मीटर लंबे स्टील गार्डर मोटर पुल का निर्माण कार्य वर्ष 2022 में शुरू हुआ था, लेकिन चार साल बीतने के बाद भी पुल अधूरा पड़ा है। हैरानी की बात यह है कि सड़क निर्माण कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा, लेकिन पुल निर्माण कार्य ठेकेदार की सुस्ती और लापरवाही की भेंट चढ़ गया।

जान जोखिम में डालकर अधूरे पुल को पार करने को मजबूर लोग
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर अधूरे पुल और खतरनाक रास्तों से आवाजाही करने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि रोज़ाना कई लोग डर के साए में पुल के ऊपर से गुजरते हैं। यदि जरा सी चूक हो जाए तो बड़ा हादसा हो सकता है।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि अगर किसी व्यक्ति की जान चली गई तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा — ठेकेदार, विभाग या प्रशासन? लोगों का कहना है कि जिम्मेदार एजेंसियां केवल नोटिस और आश्वासन देने तक सीमित हैं, जबकि आम जनता अपनी जान जोखिम में डालकर सफर कर रही है।

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ठेकेदार की मनमानी से परेशान ग्रामीण
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण एजेंसी और ठेकेदार ने शुरुआत के बाद काम लगभग ठप कर दिया। कई बार शिकायतें करने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ठेकेदार अपनी “ताकत” और प्रभाव के भरोसे काम को लगातार टालता रहा, जिसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है।
पुल निर्माण न होने के कारण ग्रामीणों को करीब 18 किलोमीटर अतिरिक्त पैदल सफर करना पड़ रहा है। सबसे अधिक दिक्कत स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और मरीजों को उठानी पड़ रही है। बरसात नजदीक आने से लोगों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ने पर कई गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट सकता है।
क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार हो रहा है?”
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि आखिर जब सड़क निर्माण कार्य आगे बढ़ सकता है तो पुल निर्माण क्यों नहीं? क्या विभाग और ठेकेदार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

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स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनावों के दौरान विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीन पर हालात पूरी तरह अलग हैं। पहाड़ के गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अधिकारियों ने भी मानी ठेकेदार की लापरवाही
जब इस मामले में संबंधित अधिकारियों से बात की गई तो उन्होंने भी साफ माना कि पुल निर्माण में ठेकेदार की गंभीर लापरवाही सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार ठेकेदार को कई बार लिखित और मौखिक रूप से चेतावनी दी गई, लेकिन उसने काम शुरू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
अब विभाग की ओर से ठेकेदार को अंतिम नोटिस जारी किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि 10 दिनों के भीतर निर्माण कार्य दोबारा शुरू नहीं किया गया तो ठेकेदार का पंजीकरण ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। साथ ही बची हुई धनराशि रोककर किसी दूसरे ठेकेदार के माध्यम से पुल निर्माण पूरा कराया जाएगा।
आंदोलन की चेतावनी

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ग्रामीणों ने प्रशासन और ब्रीडकुल विभाग को ज्ञापन भेजकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो क्षेत्रवासी उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

बड़ा सवाल
आखिर 48 मीटर का पुल 4 साल में भी क्यों नहीं बन पाया?
ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
बरसात से पहले क्या सरकार और विभाग जागेंगे?
अगर कोई हादसा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या पहाड़ के लोगों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
उत्तराखंड में विकास के दावों के बीच यह मामला सरकारी निगरानी, निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली और ठेकेदारों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

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