जौराई बुग्याल में बेलक-जौराई पर्यटन मेले का भव्य समापन, पांडव नृत्य और लोक संस्कृति ने बांधा समां

उत्तरकाशी। रिपोर्ट महावीर सिंह राणा 
समुद्र तल से करीब 3100 मीटर की ऊंचाई पर फैला जौराई बुग्याल बुधवार को सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आस्था, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी स्मृतियों का जीवंत मंच बन गया। चारों ओर पहाड़, खुले आसमान के नीचे फैला बुग्याल, ढोल-दमाऊं की गूंज और उसके बीच पांडव नृत्य में झूमते ग्रामीण—ऐसा दृश्य जिसने बेलक-जौराई बुग्याल पर्यटन मेले के समापन को यादगार बना दिया।

गांव स्याब में आयोजित इस मेले में बड़ी संख्या में ग्रामीणों, श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों ने भाग लिया। मेले में जिलाधिकारी प्रशांत आर्य, गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान, ब्लॉक प्रमुख ममता पंवार, ब्लॉक प्रमुख राजदीप परमार, पूर्व विधायक विजयपाल सिंह सजवाण, भाजपा जिलाध्यक्ष नागेंद्र सिंह चौहान, पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंदन सिंह पंवार, पूर्व ब्लॉक प्रमुख विनीता रावत, भाजपा प्रदेश संयोजक जगमोहन सिंह रावत सहित क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने शिरकत की

लेकिन इस मेले की असली पहचान मंच पर मौजूद अतिथियों से कहीं आगे जाती है। इसकी जड़ें उस लोकविश्वास में दिखाई देती हैं, जिसे स्थानीय लोग महाभारत काल और पांडवों की यात्रा से जोड़कर देखते आए हैं।

क्या जौराई से होकर गुजरे थे पांडव?
स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों की मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव अपने ऊपर लगे गोत्र हत्या और युद्ध के पाप से मुक्ति की तलाश में हिमालय की ओर निकले, तब उन्होंने हिमालय के अनेक दुर्गम रास्तों और पवित्र स्थलों से होकर यात्रा की।
स्थानीय लोककथा के अनुसार जौराई बुग्याल भी उसी प्राचीन यात्रा-पथ की कड़ी रहा है। ग्रामीणों का विश्वास है कि पांडव इस क्षेत्र से होकर आगे हिमालय के पवित्र धामों की ओर बढ़े और अंततः केदार क्षेत्र तथा बदरी क्षेत्र की ओर गए।

इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि करने वाला कोई निर्णायक पुरातात्विक प्रमाण जौराई के संदर्भ में सामने नहीं आया है, लेकिन उत्तराखंड के अनेक स्थानों की तरह यहां भी लोकस्मृति, धार्मिक परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक कथाएं इस विश्वास को आज तक जीवित रखे हुए हैं।

उत्तराखंड पर्यटन विभाग भी राज्य के कई स्थलों को महाभारत से जुड़ी लोकमान्यताओं के साथ अपने “महाभारत सर्किट” में शामिल करता है। बदरीनाथ क्षेत्र के माणा गांव को पांडवों की महाप्रस्थान यात्रा से जोड़ा जाता है, जबकि केदारनाथ से भी पांडवों की प्रायश्चित यात्रा की मान्यता जुड़ी हुई है।
यही वजह है कि जौराई के लोग जब कहते हैं कि “यह रास्ता पांडवों की चाल का रास्ता रहा होगा”, तो उनके लिए यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।
ढोल की थाप पर आज भी उतरते हैं पांडव

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मेले के दौरान जब ढोल की थाप शुरू हुई तो बुग्याल का वातावरण अचानक बदल गया। स्थानीय लोग पारंपरिक वेशभूषा में पांडव नृत्य करने लगे। ढोल की गूंज पहाड़ों से टकराकर दूर तक सुनाई देती रही और लोग अपने कदमों को लोकधुन के साथ मिलाते हुए झूमते रहे।
पांडव नृत्य उत्तरकाशी की लोक-सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिले के दूसरे क्षेत्रों में भी पांडव पूजा और पांडव नृत्य की परंपरा आज तक जीवित है।
जौराई में इस नृत्य का आकर्षण इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यहां इसे स्थानीय लोग सीधे अपनी धार्मिक मान्यता और पांडवों की प्राचीन यात्रा से जोड़कर देखते हैं।
कह सकते हैं कि महाभारत का वह काल जिसे किताबों में पढ़ा जाता है, यहां ढोल की थाप, देव आस्था और लोकनृत्य के माध्यम से आज भी महसूस किया जाता है।
दूध-दही-मट्ठा और मक्खन से होती है पूजा
जौराई की परंपरा का एक और अनूठा पक्ष यहां होने वाली धार्मिक पूजा है। मेले में दूध, दही, मट्ठा और मक्खन से देवी-देवताओं तथा द्रोपदी माता का अभिषेक किया जाता है। पूजा के बाद श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
यह परंपरा हिमालयी समाज की उस जीवनशैली को भी दर्शाती है, जिसमें पशुपालन, दूध-दही और कृषि केवल आजीविका नहीं बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं।
उत्तरकाशी के दूसरे बुग्यालों में भी दूध, मक्खन और मट्ठे से जुड़े पारंपरिक उत्सव देखने को मिलते हैं। दयारा बुग्याल का प्रसिद्ध अंढूड़ी उत्सव इसका एक उदाहरण है, जहां दूध और मक्खन के साथ पारंपरिक उत्सव मनाया जाता है।
जौराई की धरती पर पहली बार पहुंचे जिलाधिकारी
इस बार मेले का सबसे भावुक क्षण उस समय आया, जब जिलाधिकारी प्रशांत आर्य पहली बार गांव पहुंचे। ग्रामीणों के अनुसार आजादी के बाद पहली बार किसी जिलाधिकारी के गांव पहुंचने से लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला।
जिलाधिकारी के स्वागत में ग्रामीणों ने जमकर नारे लगाए। पूरा गांव उत्सव के रंग में रंगा नजर आया।
मेले में जिलाधिकारी ने ग्रामीणों से संवाद करते हुए कहा कि यदि जौराई बुग्याल को पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित करना है तो सबसे पहले गांव में होमस्टे व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
उन्होंने ऐसे युवाओं की सूची और उनके संपर्क नंबर उपलब्ध कराने को कहा, जो होमस्टे शुरू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यदि युवा बकरी पालन या अन्य स्वरोजगार गतिविधियां शुरू करना चाहते हैं तो अपनी जरूरत और प्रस्ताव प्रशासन तक पहुंचाएं।
डीएम का संदेश साफ था—पर्यटन केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ाने का नाम नहीं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम भी होना चाहिए।
“हमारे गांव में पहली बार डीएम आए, यह हमारे लिए बड़ी खुशी है”

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मेले की समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह राणा ने कहा कि गांव में पहली बार जिलाधिकारी के पहुंचने से ग्रामीणों में भारी उत्साह है।

उन्होंने कहा कि जौराई बुग्याल में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और यदि प्रशासन, पर्यटन विभाग तथा जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिले तो इस क्षेत्र को नई पहचान मिल सकती है।
उन्होंने जिलाधिकारी प्रशांत आर्य, पर्यटन विभाग और गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान सहित सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए मेले की सफलता पर क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं दीं।
सड़क आई तो बदली उम्मीदों की तस्वीर
ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक सड़क सुविधा से दूर रहने के कारण जौराई क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से पीछे रहा। अब सड़क पहुंचने से उम्मीद जगी है कि जिस रास्ते से कभी केवल ग्रामीण और पशुपालक गुजरते थे, उसी रास्ते पर आने वाले वर्षों में पर्यटक भी पहुंचेंगे।
और यही जौराई की सबसे बड़ी कहानी है।
एक ओर महाभारतकालीन पांडवों से जुड़ी लोकमान्यता, दूसरी ओर 3100 मीटर की ऊंचाई पर फैला प्राकृतिक बुग्याल, तीसरी ओर पांडव नृत्य और ढोल की थाप, और चौथी ओर गांव की पारंपरिक कृषि व पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था।
अगर इन चारों को पर्यटन से जोड़ा जाए तो जौराई केवल एक मेला स्थल नहीं, बल्कि उत्तरकाशी के ग्रामीण पर्यटन का नया अध्याय बन सकता है।
ककड़ी से लेकर स्थानीय उत्पादों तक—गांव की अपनी पहचान
जौराई क्षेत्र में होने वाले स्थानीय कृषि उत्पाद भी इसकी अलग पहचान बन सकते हैं। ग्रामीणों के अनुसार यहां की ककड़ी अपने स्वाद और आकार के लिए प्रसिद्ध है। बड़े आकार की ककड़ियों का उत्पादन यहां की कृषि विविधता को दर्शाता है।
जरूरत इस बात की है कि इन स्थानीय उत्पादों को केवल बाजार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें “जौराई की पहचान” के रूप में पर्यटन से जोड़ा जाए।
होमस्टे में स्थानीय भोजन, स्थानीय अनाज, पारंपरिक दूध-दही के उत्पाद, पहाड़ी व्यंजन, ककड़ी और अन्य कृषि उत्पाद पर्यटकों को उपलब्ध कराए जाएं तो इससे गांव की अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिल सकता है।
बुग्याल केवल घास का मैदान नहीं, हिमालय की सांस्कृतिक किताब हैं
उत्तरकाशी के बुग्याल केवल हरे-भरे मैदान नहीं हैं। ये सदियों से स्थानीय समाज की अर्थव्यवस्था, पशुपालन, धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं से जुड़े रहे हैं। सरकारी जानकारी के अनुसार उत्तरकाशी के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 3500 से 4500 मीटर के बीच बुग्याल पाए जाते हैं और इनमें अनेक दुर्लभ वनस्पतियां व फूल मिलते हैं।
इसीलिए जौराई को पर्यटन के लिए विकसित करते समय इसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को बचाना भी उतना ही जरूरी होगा।
लोककथा से पर्यटन तक—जौराई के सामने नई संभावना
आज जब लोग इतिहास और पौराणिक स्थलों की तलाश में उत्तराखंड पहुंच रहे हैं, तब जौराई के पास अपने आप में एक अनूठी कहानी है।
यहां पर्यटक आए तो उन्हें केवल पहाड़ और बुग्याल देखने को न मिले, बल्कि उन्हें बताया जाए—
यह वह धरती है जहां स्थानीय मान्यता पांडवों की यात्रा की कहानी सुनाती है।
यह वह जगह है जहां द्रोपदी माता की पूजा होती है।
यह वह बुग्याल है जहां आज भी ढोल की थाप पर पांडव नृत्य जीवित है।
यह वह गांव है जहां दूध, दही, मट्ठा और मक्खन पूजा का हिस्सा हैं।
और यह वही पहाड़ है जहां आज के ग्रामीण अपने बच्चों के भविष्य के लिए पर्यटन में नई उम्मीद तलाश रहे हैं।
यही जौराई की असली ताकत है।
एक तरफ महाभारत की स्मृति, दूसरी तरफ भविष्य की राह
मेले का समापन भले ही हो गया हो, लेकिन जौराई बुग्याल की कहानी अभी शुरू हुई है।
कभी पांडवों की यात्रा से जुड़ी लोककथाओं में याद किया जाने वाला यह क्षेत्र अब पर्यटन की नई संभावनाओं की ओर बढ़ रहा है। यदि होमस्टे, सड़क, स्थानीय उत्पाद, ट्रैकिंग रूट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक पर्यटन को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाए तो आने वाले वर्षों में बेलक-जौराई बुग्याल उत्तरकाशी के प्रमुख ग्रामीण पर्यटन स्थलों में अपनी जगह बना सकता है।
और शायद तब जब कोई पर्यटक 3100 मीटर की ऊंचाई पर जौराई की धरती पर पहुंचेगा, तो उसे सिर्फ पहाड़ नहीं दिखाई देंगे।
उसे ढोल की थाप सुनाई देगी…
पांडव नृत्य दिखाई देगा…
दूध-दही और मक्खन से होती पूजा दिखाई देगी…
और स्थानीय बुजुर्गों की जुबान से एक पुरानी कहानी सुनाई देगी—
“कहते हैं, कभी इसी हिमालयी रास्ते से पांडव भी गुजरे थे…”
इतिहास इसका प्रमाण दे या न दे, लेकिन लोकस्मृति ने उस कहानी को आज तक मरने नहीं दिया है।
और यही किसी भी जीवित संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है।

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