13 साल की सड़क, 6 साल का पुल और 12 किलोमीटर की मजबूरी—लिवाड़ी की तस्वीर कब बदलेगी?

उत्तरकाशी
रिपोर्ट: महावीर सिंह राणा
सरकार दूरस्थ गांवों को सड़क से जोड़ने और ग्रामीण क्षेत्रों तक विकास की पहुंच सुनिश्चित करने के दावे करती है। लेकिन उत्तरकाशी जिले के मोरी क्षेत्र का लिवाड़ी गांव आज भी ऐसे सवालों के बीच खड़ा है, जिनका जवाब कागजों से नहीं, बल्कि गांव की जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीरों से मांगता है।

यह सवाल तब और गंभीर हो गया, जब 21 वर्षीय नवीन की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों को उसे डंडी-कंडी के सहारे करीब 12 किलोमीटर पैदल ले जाकर जखोल तक पहुंचाना पड़ा। जखोल पहुंचने के बाद ही उसे सड़क मार्ग से अस्पताल ले जाया जा सका।
यह सिर्फ एक बीमार युवक की कहानी नहीं है। यह उस पूरे गांव की तस्वीर है, जहां आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता आज भी सड़क से नहीं, बल्कि डंडी-कंडी और पैदल पगडंडी से होकर गुजरता है।
बीमारी से बड़ी चुनौती बना रास्ता
नवीन को जिस पैदल रास्ते से जखोल तक लाया गया, उसकी हालत भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। जगह-जगह रास्ता क्षतिग्रस्त है और झाड़ियों व घास से ढका हुआ है।
ऐसे रास्ते पर किसी बीमार व्यक्ति को डंडी-कंडी के सहारे ले जाना कितना कठिन और जोखिमभरा होगा, इसकी तस्वीर इस घटना ने सामने ला दी है।
2013 में स्वीकृत सड़क, 13 साल बाद भी अधूरी
ग्रामीणों के अनुसार लिवाड़ी के लिए सड़क वर्ष 2013 में स्वीकृत हुई थी। करीब 13 वर्ष गुजरने के बावजूद सड़क का निर्माण अब तक पूरा नहीं हो सका है।
ग्रामीणों का दावा है कि सड़क का लगभग 3 से 4 किलोमीटर हिस्सा अभी भी बाकी है।
अब सवाल केवल इतना नहीं है कि सड़क कब बनेगी।
सवाल यह है कि 2013 में स्वीकृत सड़क को 13 वर्ष बाद भी पूरा करने में आखिर कौन-सी बाधाएं हैं?
अगर बाधाएं हैं तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या किसी दूरस्थ गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए वहां के लोगों को किसी और गंभीर आपात स्थिति का इंतजार करना होगा?
छह साल से पुल लंबित, लकड़ी के फट्टों पर टिकी आवाजाही

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लिवाड़ी की समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक रालासों से लिवाड़ी की ओर बनने वाला पुल करीब छह साल से लंबित है।
पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को लकड़ी के फट्टों के सहारे गदेरा पार करना पड़ता है। बरसात में पानी का बहाव बढ़ने पर यह रास्ता और भी जोखिमभरा हो जाता है।
ग्रामीणों के मुताबिक पिछली बार लोक निर्माण विभाग की ओर से यहां ट्रॉली की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन इस बार वह सुविधा भी नहीं है।
ऐसे में किसी मरीज, बुजुर्ग, गर्भवती महिला या अन्य आपात स्थिति में ग्रामीणों के सामने विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं।
निरीक्षण हुए, धरने हुए… फिर भी इंतजार खत्म नहीं हुआ
ग्रामीण दिनेश सिंह, मुलायम रावत, जगमोहन रावत और गुरुदेव रावत का कहना है कि जिलाधिकारी और प्रभारी मंत्री सौरभ बहुगुणा भी क्षेत्र का निरीक्षण कर चुके हैं।
सड़क और पुल की मांग को लेकर ग्रामीण कई बार धरना-प्रदर्शन भी कर चुके हैं। ग्रामीणों के अनुसार पिछली बार विरोध स्वरूप चुनाव बहिष्कार तक किया गया, लेकिन इसके बावजूद सड़क और पुल की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
विधायक बोले—वन कानूनों के कारण आ रही बाधा
लिवाड़ी सड़क के संबंध में पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल का कहना है कि सड़क निर्माण में वन कानूनों के कारण दिक्कत आ रही है। उन्होंने कहा कि निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर कराने के लिए वह मुख्यमंत्री से वार्ता करेंगे।
विधायक के अनुसार ग्रामीणों की समस्या को देखते हुए सड़क निर्माण का रास्ता निकालने के प्रयास किए जाएंगे।
अब फाइलों से आगे बढ़कर जमीन पर समाधान की जरूरत
लिवाड़ी की कहानी में सवाल किसी एक विभाग या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें सड़क स्वीकृत होने के वर्षों बाद भी उसका अंतिम हिस्सा अधूरा रह जाता है और पुल वर्षों तक लंबित रहता है।
21 वर्षीय नवीन को 12 किलोमीटर डंडी-कंडी से सड़क तक लाने की घटना ने उस अधूरे विकास की तस्वीर सामने रख दी है, जिसे दूर बैठकर आंकड़ों में शायद पूरा माना जा सकता है, लेकिन गांव की पगडंडी पर उसकी हकीकत कुछ और है।
अब जरूरत एक और निरीक्षण, एक और आश्वासन या एक और पत्र की नहीं, बल्कि समयबद्ध कार्रवाई की है।
लिवाड़ी के ग्रामीणों का सीधा सवाल है—
“सड़क 2013 में स्वीकृत हुई थी… अब 2026 है। आखिर लिवाड़ी तक सड़क कब पहुंचेगी?”
यह सवाल सिर्फ लिवाड़ी का नहीं, बल्कि उन तमाम दूरस्थ पहाड़ी गांवों का है जहां आज भी आपातकाल में सड़क नहीं, इंसान कंधा बनता है।

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