खतरे में गंगा का उद्गम: सिकुड़ता गोमुख, बढ़ती चिंता

उत्तरकाशी
रिपोर्ट महावीर सिंह राणा
हिमालय की गोद में, समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित गोमुख ग्लेशियर सिर्फ बर्फ का एक विशाल ढेर नहीं है—यह आस्था, जीवन और सभ्यता का स्रोत है। यहीं से पवित्र गंगा नदी का उद्गम होता है, जिसे करोड़ों लोग मां का दर्जा देते हैं। लेकिन आज यही पवित्र धरोहर एक गंभीर संकट से गुजर रही है।


धीरे-धीरे गायब होता हिमालय का हृदय
विशेषज्ञों के अनुसार, गंगोत्री ग्लेशियर का हिस्सा गोमुख पिछले कुछ दशकों में तेजी से पीछे खिसक रहा है। जियोलॉजिकल विशेषज्ञ डॉ. पंकज पंत के अनुसार, ग्लेशियर हर साल लगभग 28–30 मीटर तक पीछे हट रहा है। पिछले 60 वर्षों में यह कई किलोमीटर तक सिकुड़ चुका है।

यह बदलाव केवल बर्फ के पिघलने तक सीमित नहीं है—यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। जहां पहले स्थिर बर्फ थी, वहां अब दरारें, झीलें और अस्थिर भूभाग दिखाई देने लगे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता प्रभाव
ग्लोबल वार्मिंग अब किताबों का विषय नहीं रहा, बल्कि पहाड़ों की हकीकत बन चुका है। तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी ग्लेशियर के भीतर गर्मी पैदा कर रही है, जिससे पिघलने की गति तेज हो गई है।
वनों में लगने वाली आग से उठने वाली राख जब बर्फ पर जमती है, तो वह सफेद सतह को काला कर देती है—जिससे सूर्य की गर्मी अधिक अवशोषित होती है और पिघलाव और तेज हो जाता है।
प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता खतरा
हिमालय में बदलता मौसम अब साफ दिखाई देने लगा है—कहीं अत्यधिक बारिश, तो कहीं सूखा।
केदारनाथ आपदा 2013 और उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र की हालिया घटनाएं इस असंतुलन की चेतावनी हैं। बादल फटना, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
भविष्य की भयावह तस्वीर
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यही स्थिति रही, तो इस सदी के अंत तक हिंदूकुश-हिमालय के 75–80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं। इसका सीधा असर 50 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ेगा, जो नदियों के जल पर निर्भर हैं।
यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है।

क्या किया जा सकता है?
स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन अभी भी समय है—
ग्रीनहाउस गैसों में कमी: जीवाश्म ईंधन का उपयोग घटाकर सौर और पवन ऊर्जा अपनानी होगी।
वनों की सुरक्षा: अधिक से अधिक पेड़ लगाना और जंगलों की कटाई रोकना जरूरी है।
अवैज्ञानिक निर्माण पर रोक: पहाड़ों में अनियंत्रित निर्माण और खनन को सीमित करना होगा।
नियंत्रित पर्यटन: गंगोत्री से गोमुख तक मानव गतिविधियों को संतुलित और नियंत्रित करना जरूरी है।
निरंतर निगरानी: ग्लेशियरों की वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और शोध को बढ़ावा देना होगा।
आस्था और अस्तित्व की लड़ाई
गोमुख केवल एक स्थान नहीं—यह हमारी संस्कृति, आस्था और प्रकृति का संगम है। अगर आज हमने कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां शायद केवल किताबों में ही गंगा के उद्गम की कहानी पढ़ेंगी।
अब सवाल यह नहीं कि खतरा है या नहीं—सवाल यह है कि हम इसे बचाने के लिए क्या कर रहे हैं।

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